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सामूहिक दुष्कर्म में पीड़िता को पकड़ने या पहरा देने वाला भी मुख्य आरोपी के समान दोषी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि अपराध को अंजाम देने में सक्रिय सहयोग करने वाला प्रत्येक व्यक्ति कानून की नजर में मुख्य आरोपी के समान दोषी माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति पीड़िता को पकड़ता है, पहरा देता है या अपराध को सफल बनाने में किसी भी प्रकार का सहयोग करता है, तो वह भी समान दंड का भागी होगा।

यह फैसला न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने सुनाया। अदालत ने सामूहिक दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए दो आरोपियों की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा।

क्या था मामला?

अभियोजन के अनुसार, मामला वर्ष 1984 का है। पीड़िता और उसकी भतीजी गांव के पास जंगल में सूखी पत्तियां बीनने गई थीं। आरोप है कि पहले से मौजूद पांच लोगों ने दोनों महिलाओं को घेर लिया। इनमें से दो आरोपियों ने महिलाओं को पकड़कर रखा, दो अन्य ने उनके साथ दुष्कर्म किया, जबकि एक आरोपी पूरे घटनाक्रम के दौरान पहरा देता रहा ताकि कोई हस्तक्षेप न कर सके।

पीड़िताओं के शोर मचाने पर परिजन घटनास्थल की ओर पहुंचे, लेकिन तब तक आरोपी वहां से फरार हो चुके थे। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच पूरी की और ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 34 साझा आपराधिक मंशा के सिद्धांत पर आधारित है। यदि कई व्यक्ति एक समान उद्देश्य के साथ अपराध को अंजाम देते हैं, तो प्रत्येक व्यक्ति पूरे अपराध के लिए समान रूप से जिम्मेदार होता है।

अदालत ने कहा कि केवल यह तर्क कि किसी आरोपी ने स्वयं दुष्कर्म नहीं किया, उसे कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता। यदि उसने पीड़िता को पकड़कर रखा, पहरा दिया या अपराध को सफल बनाने में सक्रिय सहयोग किया, तो वह भी मुख्य आरोपी के समान दोषी होगा।

अपील खारिज, सजा बरकरार

मामले के सभी तथ्यों, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों की अपील खारिज कर दी। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही मानते हुए सजा को बरकरार रखा।

फैसले का महत्व

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला स्पष्ट करता है कि सामूहिक अपराधों में केवल मुख्य आरोपी ही नहीं, बल्कि अपराध को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाने वाला प्रत्येक व्यक्ति भी समान रूप से उत्तरदायी होगा। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई में महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा सकता है।